मेरी अभिलाषा है मैं लिखूं उसके बारे में
जिसके लिए हजारों विशेषण लिखने के बाद भी
मैं उसके बारे में ठीक ठीक न बता सकूँ
मैं तो केवल उसके बारे में कलम से लिख सकता हूँ
पर उसने मेरी जिंदगी लिखी अपने अथक ,क्षमता से परे
रक्त को पानी बनाते ,उसके हाड -मांस को गलाते
हजारो कभी पूरे तो कभी अधूरे प्रयासों से
हजारो माँ के व्यक्तित्व को अकेले अपने अन्दर समेटे
वो मांगती रही बड़ी- बड़ी दुआए मेरी छोटी छोटी कठिनाइयों पर
वो मुझे कहानिया सुनाती ,मुझे छोटी बड़ी सलाह देती
मै सुनता कभी उन्हें बुझे तो कभी पूरे मन से
अपनी हज़ार जरूरतों को दफ़न कर ,वो सिलवाती मेरे कपडे हर त्योहारों पर
वो मुझे सहलाती पुचकारती अपनी गोदी में बैठाती
मेरे माथे को चूमती ,उसका इन्ही बातो से बहेलता मन
मेरे बचपन से लेकर आज तक उसका व्यवहार एक जैसा है
जबकि मैं बदला कई बार उसकी आशाओं पर
उसको हमेशा याद रहती उन चीजो की जिसकी मुझे जरुरत थी
वो देती मुझे मिठाईया ,फल और अनेक ऐसी चीजे जो आती उसके हिस्से थी
वो समर्पित थी जीवन में दूसरों की कठिनाइयों को हल करने में
पर अपने दुःख से रखती सबको अनजान थी
वो रोई , कई दिनों तक उदास रही अकेली रही
जब मैं व्यस्त रहा खुद में या दूर रहा उसकी नज़रो से
मैं याद करता दिन भर भगवान को पर सपनो में तो केवल वो ही आती
मैं समझ गया वो भगवान है मेरी तभी तो सपनो में भी दुलराती .
शैलेन्द्र ऋषि
मंगलवार, मई 04, 2010
कटहल के दो पेड़
कटहल के दो पेड़ ,एक दूसरे के ठीक सामने
लम्बाई में लगभग समान, पर विचारो के स्तर या उम्र के अंतराल से
थोड़े ज्यादा तो थोड़े कम फैले हुए ,दिखते मुझे मेरे घर के ठीक पीछे
मैं देखता उन्हें उस उम्र में ,जिस उम्र के उसमे फल लगते
तेज हवाओ में एक दूसरे को सहजता से गले लगाते
कई बार झूलों के लिए काम आते वो दोनों
अपने आगोश में आने वाली हर छोटी बड़ी झाड़ियो को
पोशते ठीक वैसे जैसे अपने फल से मुझे
वो आशियाना थे अनेक छोटे और छोटे से थोडा बड़े कीड़े - मकोडो के
और अनेक उन भावनाओ के जिनका आश्रय केवल वे ही थे
वे अपनी देखभाल खुद करते ,अपने संतानों की जरूरतों में व्यस्त
अभिभावकों की तरह
उनके पत्ते रात में एक दूसरे से बताते ,दिन भर में घटी हज़ार छोटी मोटी बातो को
स्थितियों से विवश वो परिधि जिसमे वो लम्बे समय से जीवन बिताते आये
उनके अंत का कारण बनी
उन्होंने हज़ार प्रहार सहे अपने शरीर पर
पर वो मरे शायद पूर्ण समर्पण के लिए
सोचता हूँ आज फिर से लगाओं कटहल के दो पेड़
एक दूसरे के ठीक सामने ,हमउम्र जिसमे फैलाव भी समान हो
पर अपनी उम्र और उनके फलो की उम्र कैसे समान करूँ ?
और कैसे उन्हें एक साथ इतना बड़ा कर दूँ की मैं
झूला झूल सकूँ अभी उनकी डालियों पर
मैं बदल पाता अगर उन स्थितियों को तो आज वो फिर
खड़े होते एक दूसरे के ठीक सामने , लम्बाई में लगभग समान
.
शैलेन्द्र ऋषि
लम्बाई में लगभग समान, पर विचारो के स्तर या उम्र के अंतराल से
थोड़े ज्यादा तो थोड़े कम फैले हुए ,दिखते मुझे मेरे घर के ठीक पीछे
मैं देखता उन्हें उस उम्र में ,जिस उम्र के उसमे फल लगते
तेज हवाओ में एक दूसरे को सहजता से गले लगाते
कई बार झूलों के लिए काम आते वो दोनों
अपने आगोश में आने वाली हर छोटी बड़ी झाड़ियो को
पोशते ठीक वैसे जैसे अपने फल से मुझे
वो आशियाना थे अनेक छोटे और छोटे से थोडा बड़े कीड़े - मकोडो के
और अनेक उन भावनाओ के जिनका आश्रय केवल वे ही थे
वे अपनी देखभाल खुद करते ,अपने संतानों की जरूरतों में व्यस्त
अभिभावकों की तरह
उनके पत्ते रात में एक दूसरे से बताते ,दिन भर में घटी हज़ार छोटी मोटी बातो को
स्थितियों से विवश वो परिधि जिसमे वो लम्बे समय से जीवन बिताते आये
उनके अंत का कारण बनी
उन्होंने हज़ार प्रहार सहे अपने शरीर पर
पर वो मरे शायद पूर्ण समर्पण के लिए
सोचता हूँ आज फिर से लगाओं कटहल के दो पेड़
एक दूसरे के ठीक सामने ,हमउम्र जिसमे फैलाव भी समान हो
पर अपनी उम्र और उनके फलो की उम्र कैसे समान करूँ ?
और कैसे उन्हें एक साथ इतना बड़ा कर दूँ की मैं
झूला झूल सकूँ अभी उनकी डालियों पर
मैं बदल पाता अगर उन स्थितियों को तो आज वो फिर
खड़े होते एक दूसरे के ठीक सामने , लम्बाई में लगभग समान
.
शैलेन्द्र ऋषि
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