पराभव से उठने की अल्प कोशिश ,
न्यूनता ग्रहण कर जाती चंद क्षणों में
मैं उठूँगा , बढूँगा , पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा
पर इस बार फिर लक्ष्य वो नहीं
जो कुछ देर पहले तय हुए
रौशनी पड़ती रहेगी उसी तरफ से उसी जगह
पर इस बार भी आत्मसात किये गहरी छाया .
शैलेन्द्र ऋषि
सोमवार, सितंबर 20, 2010
बुधवार, सितंबर 15, 2010
कबाड़ीवाला
मेरी दस्तक है हर गलियों में
हर रोज सुबह , दुपहर या शाम
समेटने को कुछ पुराणी चीजें
जो जुडी है उन्ही गलियों के रहने वालों से
मैं तौलता हूँ
किसी वृद्ध की छड़ी के लोहे का हत्था
आराम कुर्सी के जंग लगे पाए
टूटी कमानी के चश्मे ,बागवानी के
धारहीन औजार ,इस्पात के दरार युक्त
डिब्बे ,निष्प्रयोज्य कागज के ढेर
नियत समय के बाद , लगभग हर घर से
मैं पाता हूँ इन्ही चीजों को
बदलते परिदृश्य में , सुनता हूँ आज भी
हर बच्चे को नक़ल करते मेरी आवाज
हर वर्ग के लोगो की शंकित दृष्टी
आपतित होती है , मेरी तराजू पर
मुझे इंतज़ार है ,सामाजिक त्योहारों का.
मैं अनादी काल तक जीवित रहूँगा
संकलन करते लोगों का बदलाव
मैं खरीदता रहूँगा हर बार
केवल वही पुराने सामान नहीं
उनके ईमान ,पुरानी सोच को
किसी न किसी रूप में
वहीँ उन्हीं की गलियों में
सुबह , दुपहर या शाम.
शैलेन्द्र ऋषि
हर रोज सुबह , दुपहर या शाम
समेटने को कुछ पुराणी चीजें
जो जुडी है उन्ही गलियों के रहने वालों से
मैं तौलता हूँ
किसी वृद्ध की छड़ी के लोहे का हत्था
आराम कुर्सी के जंग लगे पाए
टूटी कमानी के चश्मे ,बागवानी के
धारहीन औजार ,इस्पात के दरार युक्त
डिब्बे ,निष्प्रयोज्य कागज के ढेर
नियत समय के बाद , लगभग हर घर से
मैं पाता हूँ इन्ही चीजों को
बदलते परिदृश्य में , सुनता हूँ आज भी
हर बच्चे को नक़ल करते मेरी आवाज
हर वर्ग के लोगो की शंकित दृष्टी
आपतित होती है , मेरी तराजू पर
मुझे इंतज़ार है ,सामाजिक त्योहारों का.
मैं अनादी काल तक जीवित रहूँगा
संकलन करते लोगों का बदलाव
मैं खरीदता रहूँगा हर बार
केवल वही पुराने सामान नहीं
उनके ईमान ,पुरानी सोच को
किसी न किसी रूप में
वहीँ उन्हीं की गलियों में
सुबह , दुपहर या शाम.
शैलेन्द्र ऋषि
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