पराभव से उठने की अल्प कोशिश ,
न्यूनता ग्रहण कर जाती चंद क्षणों में
मैं उठूँगा , बढूँगा , पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा
पर इस बार फिर लक्ष्य वो नहीं
जो कुछ देर पहले तय हुए
रौशनी पड़ती रहेगी उसी तरफ से उसी जगह
पर इस बार भी आत्मसात किये गहरी छाया .
शैलेन्द्र ऋषि
सोमवार, सितंबर 20, 2010
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