बुधवार, सितंबर 15, 2010

कबाड़ीवाला

मेरी दस्तक है हर गलियों में 
हर रोज सुबह , दुपहर या शाम
समेटने को कुछ पुराणी चीजें
जो जुडी है उन्ही गलियों के रहने वालों से


मैं तौलता हूँ
किसी वृद्ध की छड़ी के लोहे  का हत्था
आराम कुर्सी के जंग लगे पाए
टूटी कमानी के चश्मे ,बागवानी के
धारहीन  औजार ,इस्पात के दरार युक्त
डिब्बे ,निष्प्रयोज्य  कागज के ढेर


नियत समय के बाद , लगभग हर घर से
मैं पाता हूँ इन्ही चीजों  को
बदलते परिदृश्य में , सुनता हूँ आज भी
हर बच्चे को नक़ल करते मेरी आवाज


हर वर्ग के लोगो की शंकित दृष्टी
आपतित होती है , मेरी तराजू पर
मुझे इंतज़ार है ,सामाजिक त्योहारों का.


मैं अनादी काल तक जीवित रहूँगा
संकलन करते लोगों का बदलाव


मैं खरीदता रहूँगा हर बार
केवल वही  पुराने सामान नहीं
उनके ईमान ,पुरानी सोच को
किसी न किसी रूप में
वहीँ उन्हीं की गलियों में
सुबह , दुपहर या शाम.




शैलेन्द्र ऋषि

मंगलवार, मई 04, 2010

मेरी दादी

मेरी अभिलाषा है मैं लिखूं उसके बारे में 
जिसके लिए हजारों विशेषण लिखने के बाद भी 
मैं उसके बारे में ठीक ठीक न बता सकूँ 
मैं तो केवल उसके बारे में कलम से लिख सकता हूँ 
पर उसने मेरी जिंदगी लिखी अपने अथक ,क्षमता से परे 
रक्त को पानी बनाते ,उसके हाड -मांस को गलाते 
हजारो कभी पूरे तो कभी अधूरे प्रयासों से 
हजारो माँ के व्यक्तित्व को अकेले अपने अन्दर समेटे 
वो मांगती रही बड़ी- बड़ी दुआए  मेरी छोटी छोटी कठिनाइयों पर 
वो मुझे कहानिया सुनाती ,मुझे छोटी बड़ी सलाह देती 
मै सुनता कभी उन्हें बुझे तो कभी पूरे मन से 
अपनी हज़ार जरूरतों को दफ़न कर ,वो सिलवाती मेरे कपडे हर त्योहारों पर 
वो मुझे सहलाती पुचकारती अपनी गोदी में बैठाती 
मेरे माथे को चूमती ,उसका इन्ही बातो से बहेलता मन 
मेरे बचपन से लेकर आज तक उसका व्यवहार एक जैसा है 
जबकि मैं बदला कई बार उसकी आशाओं पर 
उसको हमेशा याद रहती उन चीजो की जिसकी मुझे जरुरत थी 
वो देती मुझे मिठाईया ,फल और अनेक ऐसी चीजे जो आती उसके हिस्से थी
वो समर्पित थी जीवन में दूसरों की कठिनाइयों  को हल करने में 
पर अपने दुःख से रखती सबको अनजान थी 
वो रोई , कई दिनों तक उदास रही अकेली रही 
जब मैं व्यस्त रहा खुद में या दूर रहा उसकी नज़रो से 
मैं याद करता दिन भर भगवान को पर सपनो में तो केवल वो ही आती 
मैं समझ गया वो भगवान है मेरी तभी तो सपनो में भी दुलराती .

शैलेन्द्र ऋषि  

कटहल के दो पेड़

कटहल के दो पेड़ ,एक दूसरे के ठीक सामने

लम्बाई में लगभग समान, पर विचारो के स्तर या उम्र के अंतराल से 

थोड़े ज्यादा तो थोड़े कम फैले हुए ,दिखते मुझे मेरे घर के ठीक पीछे  

मैं देखता उन्हें उस उम्र में ,जिस उम्र के उसमे फल लगते

तेज हवाओ में एक दूसरे को सहजता से गले लगाते

कई बार झूलों के लिए काम आते वो दोनों

अपने आगोश में आने वाली हर छोटी बड़ी झाड़ियो को

पोशते ठीक वैसे जैसे अपने फल से मुझे

वो आशियाना थे अनेक छोटे और छोटे से थोडा बड़े कीड़े - मकोडो के

और अनेक उन भावनाओ के जिनका आश्रय केवल वे ही थे

वे अपनी देखभाल खुद करते ,अपने संतानों की जरूरतों में व्यस्त

अभिभावकों की तरह

उनके पत्ते रात में एक दूसरे से बताते ,दिन भर में घटी हज़ार छोटी मोटी बातो को

स्थितियों से विवश  वो परिधि जिसमे वो लम्बे समय से जीवन बिताते आये

उनके अंत का कारण बनी

उन्होंने हज़ार प्रहार सहे अपने शरीर पर

पर वो मरे शायद पूर्ण समर्पण के लिए 

सोचता हूँ आज फिर से लगाओं कटहल के दो पेड़ 

एक दूसरे के ठीक सामने ,हमउम्र जिसमे फैलाव  भी समान हो 

पर अपनी उम्र और उनके फलो की उम्र कैसे समान करूँ ?

और कैसे उन्हें एक साथ इतना बड़ा कर दूँ की मैं 

झूला झूल सकूँ अभी उनकी डालियों पर 

मैं बदल पाता अगर उन स्थितियों को तो आज वो फिर 

खड़े होते एक दूसरे के ठीक सामने , लम्बाई में लगभग समान

.


शैलेन्द्र ऋषि   



शुक्रवार, अप्रैल 16, 2010

पहचान

तुम जर्रे को पहचानो जर्रा तुमको पहचाने 
शायद मंजिल की पहचान हो जाए 
यूँ ही मदमस्त हवाओ के साथ बढ़ते चलो 
शायद नए इतिहास का दीदार हो जाये.

शैलेन्द्र ऋषि  

हालात

आधी सल्तनत की लौ अभी बाकी थी
लो हम फिर काबिज हो गए तुम्हारे अधिकारों पर
जिरह की खिड़कियाँ फट फटा रही है
ये तुम सोचो की हवा आ रही है या जा रही है
जज्बे के पुलिंदे बनाकर कब तक मौज करोगे
एक भूखी रात ही क़यामत होगी आशियाने पर
जिक्र करते हो जिनका दिल -ए- करीब में
वो भी शराफत छोड़कर हैवान हो जायेंगे
बस अपनी रूह को यूँही भिगो कर रख
दस्तूर भी सिमट जायेंगे फिजाओं के पैमाने पर
मजहब की दीवारों की सिमटी परछाई है तुम पर
ये सोच कर कब तक सजदा करते रहोगे
एड़ियाँ घूरती है घुटनों को चिलचिलाती धूप में
जब लाश का पता लिख जाता है कोई मैखाने पर.

शैलेन्द्र ऋषि 

अकेला आदमी

अकेला आदमी , यूँ ही कही बंद
तो कभी निर्धारित असीमित दूरियों पर
अकेला घूमता है
अकेला आदमी , एक साथ कई यात्राये करता है
विचारो के वाहन पर सवार
कभी थोड़ी तो कभी एक लम्बे
अंतराल पर बार बार उतरता है
वो सोचता है अपने आस पास की अनंत
उन बातो को जिन्होंने उसे उसके अपने अकेलेपन से दूर रखा .

शैलेन्द्र ऋषि 

अमिया

 टिकोरे से बड़ी ,आम से छोटी
 धूप में अपनी सुगंध बिखेरती अमिया
 नवजातता को विखंडित कर
पूर्ण विकास से थोड़ी दूर अमिया
बच्चो में स्वाद की उत्कंठा की पूर्ति हेतु
उनके एक छोटे प्रहार की प्रतीक्षा में अमिया
कठोरता के भी अल्प विकास के दौर में
चीटियों को आमंत्रित करती अमिया
पक्षियों से सहज ही सहृदयता की भावना रख
हलके हवों के झोंको से पूरी मौज में झूमती अमिया
अबकी तुमको फिर तोड़ेंगे कोमलता को चुनने वाले
फिर भी हमेशा बागो में मुस्कराती अमिया .
कभी पूरी प्रकृति  सिमटी दिखती बागों के इस प्रतिमानों में
सोचता हूँ जिन्दगी की डाल से टूटने के पहले
मैं भी क्यों न बन जाऊं अमिया ?

शैलेन्द्र ऋषि