Today I am sad because I have not that shade
A shade which was with me when I was embryo
A shade that protect me from all evil & evildoer
When I have no sense.
A shade that care me when I started crawling .
And remember my hunger whenever I forget .
.
Today I am sad because I have not that feel .
When I heard a single loud clap in ground .
Although I got last position in the race.
A Feel that feel myself
When everyone go against me in the world.
A feel for that I am most great.
Today I am sad because I have not that power
That force and encourage me
When I first time fell down
A power that stop me to go wrong way.
And make me capable to find out
What is good and bad for me.
Today I am sad because I am fool
Who think her way to taught
Her rude nature .
While she making myself strong
To face all thunder of world.
Today I am sad and I think I will always sad.
Because she has started to think
That I am mature now.
And I have no need to her .
Because I have started to give suggestion her.
( SHAILENDRA RISHI )
बुधवार, नवंबर 03, 2010
O LIGHT! MY LIGHT
O LIGHT! MY LIGHT
WHAT A TREMENDOUS THING YOU ARE
YOU ARE GREAT RECOGNISER
WHEN YOU ARE OUTSIDE MY BODY.
YOU BRING MY THOUGHTS UP
WHEN YOU ARE INSIDE MY BODY.
MANY TIMES YOU ARE A SOCIAL PROTECTOR/REFORMER
WHEN YOU COME FROM THE POLE OF ROADSIDE.
O LIGHT! MY LIGHT
YOU TOO PART OF SPRITUAL THINGS.
BUT YOU NEVER THINK ABOUT RELIGLION
CAST, ECONOMIC LEVEL & QUALITY.
EVERYONE FEEL YOU SIMILERLY
ALL PARTS OF WORLD.
O LIGHT! MY LIGHT
YOU COME FROM THE HOLE OF
A POORMAN'S WALL
YOU TOO COME FROM THE BIGWINDOW
OF A RICH MAN HOUSE
HOW SIMPLE, HOW DIFFRENT, HOW WONDERFUL
YOU PERFORM LIKE A GOD.
O LIGHT! MY LIGHT
MANY TIMES I SEE YOU IN PICTURE
BEHIND THE GOD
BUT I THINK YOUR CHARM, THINKING,
AND ACT IS BEYOND THE LIMIT
O LIGHT! MY LIGHT
YOU GIVE WARMNESS TO A NUDE
POOR PEOPLE IN COLD
YOU TOO MAKE GREEN LEAVES
ROUGH AND DRY.
HOW A GOOD CARETAKER
AND DESTRUCTIVE YOU ARE
O LIGHT! MY LIGHT
CARRY ON MY LIGHT PLEASE
AS YOU WERE IN ORIGIN OF WORLD
AS YOU WILL IN THE END OF WORLD
( SHAILENDRA RISHI )
WHAT A TREMENDOUS THING YOU ARE
YOU ARE GREAT RECOGNISER
WHEN YOU ARE OUTSIDE MY BODY.
YOU BRING MY THOUGHTS UP
WHEN YOU ARE INSIDE MY BODY.
MANY TIMES YOU ARE A SOCIAL PROTECTOR/REFORMER
WHEN YOU COME FROM THE POLE OF ROADSIDE.
O LIGHT! MY LIGHT
YOU TOO PART OF SPRITUAL THINGS.
BUT YOU NEVER THINK ABOUT RELIGLION
CAST, ECONOMIC LEVEL & QUALITY.
EVERYONE FEEL YOU SIMILERLY
ALL PARTS OF WORLD.
O LIGHT! MY LIGHT
YOU COME FROM THE HOLE OF
A POORMAN'S WALL
YOU TOO COME FROM THE BIGWINDOW
OF A RICH MAN HOUSE
HOW SIMPLE, HOW DIFFRENT, HOW WONDERFUL
YOU PERFORM LIKE A GOD.
O LIGHT! MY LIGHT
MANY TIMES I SEE YOU IN PICTURE
BEHIND THE GOD
BUT I THINK YOUR CHARM, THINKING,
AND ACT IS BEYOND THE LIMIT
O LIGHT! MY LIGHT
YOU GIVE WARMNESS TO A NUDE
POOR PEOPLE IN COLD
YOU TOO MAKE GREEN LEAVES
ROUGH AND DRY.
HOW A GOOD CARETAKER
AND DESTRUCTIVE YOU ARE
O LIGHT! MY LIGHT
CARRY ON MY LIGHT PLEASE
AS YOU WERE IN ORIGIN OF WORLD
AS YOU WILL IN THE END OF WORLD
( SHAILENDRA RISHI )
सोमवार, सितंबर 20, 2010
भटकाव
पराभव से उठने की अल्प कोशिश ,
न्यूनता ग्रहण कर जाती चंद क्षणों में
मैं उठूँगा , बढूँगा , पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा
पर इस बार फिर लक्ष्य वो नहीं
जो कुछ देर पहले तय हुए
रौशनी पड़ती रहेगी उसी तरफ से उसी जगह
पर इस बार भी आत्मसात किये गहरी छाया .
शैलेन्द्र ऋषि
न्यूनता ग्रहण कर जाती चंद क्षणों में
मैं उठूँगा , बढूँगा , पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा
पर इस बार फिर लक्ष्य वो नहीं
जो कुछ देर पहले तय हुए
रौशनी पड़ती रहेगी उसी तरफ से उसी जगह
पर इस बार भी आत्मसात किये गहरी छाया .
शैलेन्द्र ऋषि
बुधवार, सितंबर 15, 2010
कबाड़ीवाला
मेरी दस्तक है हर गलियों में
हर रोज सुबह , दुपहर या शाम
समेटने को कुछ पुराणी चीजें
जो जुडी है उन्ही गलियों के रहने वालों से
मैं तौलता हूँ
किसी वृद्ध की छड़ी के लोहे का हत्था
आराम कुर्सी के जंग लगे पाए
टूटी कमानी के चश्मे ,बागवानी के
धारहीन औजार ,इस्पात के दरार युक्त
डिब्बे ,निष्प्रयोज्य कागज के ढेर
नियत समय के बाद , लगभग हर घर से
मैं पाता हूँ इन्ही चीजों को
बदलते परिदृश्य में , सुनता हूँ आज भी
हर बच्चे को नक़ल करते मेरी आवाज
हर वर्ग के लोगो की शंकित दृष्टी
आपतित होती है , मेरी तराजू पर
मुझे इंतज़ार है ,सामाजिक त्योहारों का.
मैं अनादी काल तक जीवित रहूँगा
संकलन करते लोगों का बदलाव
मैं खरीदता रहूँगा हर बार
केवल वही पुराने सामान नहीं
उनके ईमान ,पुरानी सोच को
किसी न किसी रूप में
वहीँ उन्हीं की गलियों में
सुबह , दुपहर या शाम.
शैलेन्द्र ऋषि
हर रोज सुबह , दुपहर या शाम
समेटने को कुछ पुराणी चीजें
जो जुडी है उन्ही गलियों के रहने वालों से
मैं तौलता हूँ
किसी वृद्ध की छड़ी के लोहे का हत्था
आराम कुर्सी के जंग लगे पाए
टूटी कमानी के चश्मे ,बागवानी के
धारहीन औजार ,इस्पात के दरार युक्त
डिब्बे ,निष्प्रयोज्य कागज के ढेर
नियत समय के बाद , लगभग हर घर से
मैं पाता हूँ इन्ही चीजों को
बदलते परिदृश्य में , सुनता हूँ आज भी
हर बच्चे को नक़ल करते मेरी आवाज
हर वर्ग के लोगो की शंकित दृष्टी
आपतित होती है , मेरी तराजू पर
मुझे इंतज़ार है ,सामाजिक त्योहारों का.
मैं अनादी काल तक जीवित रहूँगा
संकलन करते लोगों का बदलाव
मैं खरीदता रहूँगा हर बार
केवल वही पुराने सामान नहीं
उनके ईमान ,पुरानी सोच को
किसी न किसी रूप में
वहीँ उन्हीं की गलियों में
सुबह , दुपहर या शाम.
शैलेन्द्र ऋषि
मंगलवार, मई 04, 2010
मेरी दादी
मेरी अभिलाषा है मैं लिखूं उसके बारे में
जिसके लिए हजारों विशेषण लिखने के बाद भी
मैं उसके बारे में ठीक ठीक न बता सकूँ
मैं तो केवल उसके बारे में कलम से लिख सकता हूँ
पर उसने मेरी जिंदगी लिखी अपने अथक ,क्षमता से परे
रक्त को पानी बनाते ,उसके हाड -मांस को गलाते
हजारो कभी पूरे तो कभी अधूरे प्रयासों से
हजारो माँ के व्यक्तित्व को अकेले अपने अन्दर समेटे
वो मांगती रही बड़ी- बड़ी दुआए मेरी छोटी छोटी कठिनाइयों पर
वो मुझे कहानिया सुनाती ,मुझे छोटी बड़ी सलाह देती
मै सुनता कभी उन्हें बुझे तो कभी पूरे मन से
अपनी हज़ार जरूरतों को दफ़न कर ,वो सिलवाती मेरे कपडे हर त्योहारों पर
वो मुझे सहलाती पुचकारती अपनी गोदी में बैठाती
मेरे माथे को चूमती ,उसका इन्ही बातो से बहेलता मन
मेरे बचपन से लेकर आज तक उसका व्यवहार एक जैसा है
जबकि मैं बदला कई बार उसकी आशाओं पर
उसको हमेशा याद रहती उन चीजो की जिसकी मुझे जरुरत थी
वो देती मुझे मिठाईया ,फल और अनेक ऐसी चीजे जो आती उसके हिस्से थी
वो समर्पित थी जीवन में दूसरों की कठिनाइयों को हल करने में
पर अपने दुःख से रखती सबको अनजान थी
वो रोई , कई दिनों तक उदास रही अकेली रही
जब मैं व्यस्त रहा खुद में या दूर रहा उसकी नज़रो से
मैं याद करता दिन भर भगवान को पर सपनो में तो केवल वो ही आती
मैं समझ गया वो भगवान है मेरी तभी तो सपनो में भी दुलराती .
शैलेन्द्र ऋषि
जिसके लिए हजारों विशेषण लिखने के बाद भी
मैं उसके बारे में ठीक ठीक न बता सकूँ
मैं तो केवल उसके बारे में कलम से लिख सकता हूँ
पर उसने मेरी जिंदगी लिखी अपने अथक ,क्षमता से परे
रक्त को पानी बनाते ,उसके हाड -मांस को गलाते
हजारो कभी पूरे तो कभी अधूरे प्रयासों से
हजारो माँ के व्यक्तित्व को अकेले अपने अन्दर समेटे
वो मांगती रही बड़ी- बड़ी दुआए मेरी छोटी छोटी कठिनाइयों पर
वो मुझे कहानिया सुनाती ,मुझे छोटी बड़ी सलाह देती
मै सुनता कभी उन्हें बुझे तो कभी पूरे मन से
अपनी हज़ार जरूरतों को दफ़न कर ,वो सिलवाती मेरे कपडे हर त्योहारों पर
वो मुझे सहलाती पुचकारती अपनी गोदी में बैठाती
मेरे माथे को चूमती ,उसका इन्ही बातो से बहेलता मन
मेरे बचपन से लेकर आज तक उसका व्यवहार एक जैसा है
जबकि मैं बदला कई बार उसकी आशाओं पर
उसको हमेशा याद रहती उन चीजो की जिसकी मुझे जरुरत थी
वो देती मुझे मिठाईया ,फल और अनेक ऐसी चीजे जो आती उसके हिस्से थी
वो समर्पित थी जीवन में दूसरों की कठिनाइयों को हल करने में
पर अपने दुःख से रखती सबको अनजान थी
वो रोई , कई दिनों तक उदास रही अकेली रही
जब मैं व्यस्त रहा खुद में या दूर रहा उसकी नज़रो से
मैं याद करता दिन भर भगवान को पर सपनो में तो केवल वो ही आती
मैं समझ गया वो भगवान है मेरी तभी तो सपनो में भी दुलराती .
शैलेन्द्र ऋषि
कटहल के दो पेड़
कटहल के दो पेड़ ,एक दूसरे के ठीक सामने
लम्बाई में लगभग समान, पर विचारो के स्तर या उम्र के अंतराल से
थोड़े ज्यादा तो थोड़े कम फैले हुए ,दिखते मुझे मेरे घर के ठीक पीछे
मैं देखता उन्हें उस उम्र में ,जिस उम्र के उसमे फल लगते
तेज हवाओ में एक दूसरे को सहजता से गले लगाते
कई बार झूलों के लिए काम आते वो दोनों
अपने आगोश में आने वाली हर छोटी बड़ी झाड़ियो को
पोशते ठीक वैसे जैसे अपने फल से मुझे
वो आशियाना थे अनेक छोटे और छोटे से थोडा बड़े कीड़े - मकोडो के
और अनेक उन भावनाओ के जिनका आश्रय केवल वे ही थे
वे अपनी देखभाल खुद करते ,अपने संतानों की जरूरतों में व्यस्त
अभिभावकों की तरह
उनके पत्ते रात में एक दूसरे से बताते ,दिन भर में घटी हज़ार छोटी मोटी बातो को
स्थितियों से विवश वो परिधि जिसमे वो लम्बे समय से जीवन बिताते आये
उनके अंत का कारण बनी
उन्होंने हज़ार प्रहार सहे अपने शरीर पर
पर वो मरे शायद पूर्ण समर्पण के लिए
सोचता हूँ आज फिर से लगाओं कटहल के दो पेड़
एक दूसरे के ठीक सामने ,हमउम्र जिसमे फैलाव भी समान हो
पर अपनी उम्र और उनके फलो की उम्र कैसे समान करूँ ?
और कैसे उन्हें एक साथ इतना बड़ा कर दूँ की मैं
झूला झूल सकूँ अभी उनकी डालियों पर
मैं बदल पाता अगर उन स्थितियों को तो आज वो फिर
खड़े होते एक दूसरे के ठीक सामने , लम्बाई में लगभग समान
.
शैलेन्द्र ऋषि
लम्बाई में लगभग समान, पर विचारो के स्तर या उम्र के अंतराल से
थोड़े ज्यादा तो थोड़े कम फैले हुए ,दिखते मुझे मेरे घर के ठीक पीछे
मैं देखता उन्हें उस उम्र में ,जिस उम्र के उसमे फल लगते
तेज हवाओ में एक दूसरे को सहजता से गले लगाते
कई बार झूलों के लिए काम आते वो दोनों
अपने आगोश में आने वाली हर छोटी बड़ी झाड़ियो को
पोशते ठीक वैसे जैसे अपने फल से मुझे
वो आशियाना थे अनेक छोटे और छोटे से थोडा बड़े कीड़े - मकोडो के
और अनेक उन भावनाओ के जिनका आश्रय केवल वे ही थे
वे अपनी देखभाल खुद करते ,अपने संतानों की जरूरतों में व्यस्त
अभिभावकों की तरह
उनके पत्ते रात में एक दूसरे से बताते ,दिन भर में घटी हज़ार छोटी मोटी बातो को
स्थितियों से विवश वो परिधि जिसमे वो लम्बे समय से जीवन बिताते आये
उनके अंत का कारण बनी
उन्होंने हज़ार प्रहार सहे अपने शरीर पर
पर वो मरे शायद पूर्ण समर्पण के लिए
सोचता हूँ आज फिर से लगाओं कटहल के दो पेड़
एक दूसरे के ठीक सामने ,हमउम्र जिसमे फैलाव भी समान हो
पर अपनी उम्र और उनके फलो की उम्र कैसे समान करूँ ?
और कैसे उन्हें एक साथ इतना बड़ा कर दूँ की मैं
झूला झूल सकूँ अभी उनकी डालियों पर
मैं बदल पाता अगर उन स्थितियों को तो आज वो फिर
खड़े होते एक दूसरे के ठीक सामने , लम्बाई में लगभग समान
.
शैलेन्द्र ऋषि
शुक्रवार, अप्रैल 16, 2010
पहचान
तुम जर्रे को पहचानो जर्रा तुमको पहचाने
शायद मंजिल की पहचान हो जाए
यूँ ही मदमस्त हवाओ के साथ बढ़ते चलो
शायद नए इतिहास का दीदार हो जाये.
शैलेन्द्र ऋषि
शायद मंजिल की पहचान हो जाए
यूँ ही मदमस्त हवाओ के साथ बढ़ते चलो
शायद नए इतिहास का दीदार हो जाये.
शैलेन्द्र ऋषि
हालात
आधी सल्तनत की लौ अभी बाकी थी
लो हम फिर काबिज हो गए तुम्हारे अधिकारों पर
जिरह की खिड़कियाँ फट फटा रही है
ये तुम सोचो की हवा आ रही है या जा रही है
जज्बे के पुलिंदे बनाकर कब तक मौज करोगे
एक भूखी रात ही क़यामत होगी आशियाने पर
जिक्र करते हो जिनका दिल -ए- करीब में
वो भी शराफत छोड़कर हैवान हो जायेंगे
बस अपनी रूह को यूँही भिगो कर रख
दस्तूर भी सिमट जायेंगे फिजाओं के पैमाने पर
मजहब की दीवारों की सिमटी परछाई है तुम पर
ये सोच कर कब तक सजदा करते रहोगे
एड़ियाँ घूरती है घुटनों को चिलचिलाती धूप में
जब लाश का पता लिख जाता है कोई मैखाने पर.
शैलेन्द्र ऋषि
अकेला आदमी
अकेला आदमी , यूँ ही कही बंद
तो कभी निर्धारित असीमित दूरियों पर
अकेला घूमता है
अकेला आदमी , एक साथ कई यात्राये करता है
विचारो के वाहन पर सवार
कभी थोड़ी तो कभी एक लम्बे
अंतराल पर बार बार उतरता है
वो सोचता है अपने आस पास की अनंत
उन बातो को जिन्होंने उसे उसके अपने अकेलेपन से दूर रखा .
शैलेन्द्र ऋषि
तो कभी निर्धारित असीमित दूरियों पर
अकेला घूमता है
अकेला आदमी , एक साथ कई यात्राये करता है
विचारो के वाहन पर सवार
कभी थोड़ी तो कभी एक लम्बे
अंतराल पर बार बार उतरता है
वो सोचता है अपने आस पास की अनंत
उन बातो को जिन्होंने उसे उसके अपने अकेलेपन से दूर रखा .
शैलेन्द्र ऋषि
अमिया
टिकोरे से बड़ी ,आम से छोटी
धूप में अपनी सुगंध बिखेरती अमिया
नवजातता को विखंडित कर
पूर्ण विकास से थोड़ी दूर अमिया
बच्चो में स्वाद की उत्कंठा की पूर्ति हेतु
उनके एक छोटे प्रहार की प्रतीक्षा में अमिया
कठोरता के भी अल्प विकास के दौर में
चीटियों को आमंत्रित करती अमिया
पक्षियों से सहज ही सहृदयता की भावना रख
हलके हवों के झोंको से पूरी मौज में झूमती अमिया
अबकी तुमको फिर तोड़ेंगे कोमलता को चुनने वाले
फिर भी हमेशा बागो में मुस्कराती अमिया .
कभी पूरी प्रकृति सिमटी दिखती बागों के इस प्रतिमानों में
सोचता हूँ जिन्दगी की डाल से टूटने के पहले
मैं भी क्यों न बन जाऊं अमिया ?
शैलेन्द्र ऋषि
धूप में अपनी सुगंध बिखेरती अमिया
नवजातता को विखंडित कर
पूर्ण विकास से थोड़ी दूर अमिया
बच्चो में स्वाद की उत्कंठा की पूर्ति हेतु
उनके एक छोटे प्रहार की प्रतीक्षा में अमिया
कठोरता के भी अल्प विकास के दौर में
चीटियों को आमंत्रित करती अमिया
पक्षियों से सहज ही सहृदयता की भावना रख
हलके हवों के झोंको से पूरी मौज में झूमती अमिया
अबकी तुमको फिर तोड़ेंगे कोमलता को चुनने वाले
फिर भी हमेशा बागो में मुस्कराती अमिया .
कभी पूरी प्रकृति सिमटी दिखती बागों के इस प्रतिमानों में
सोचता हूँ जिन्दगी की डाल से टूटने के पहले
मैं भी क्यों न बन जाऊं अमिया ?
शैलेन्द्र ऋषि
मैं उससे मिला
मैं उससे मिला ,अपने व्यस्ततम दिनों में
वह व्यक्ति था, सामाजिक परिभाषा से
वह पागल था, अपने कार्य व्यवहार से
वह दार्शनिक था , अपने स्वतंत्र विचारो से
और शायद वह देवदूत था
अपने कार्य के पीछे की निर्दोष भावना से
मैं उससे मिला जब मैं विचारो और भानु
की उष्णता से युक्त था
और वो अपने ही ब्रह्माण्ड में टहलता ,जीवन
के झंझटो से मुक्त था
उसने शायद जिंदगी में गालिया ही कमाई थी
तभी तो इन्हें दे वो सामान की मांग करता
मैं भी अन्य संभ्रांतो की भांति उसकी
बातो पर हँस लेता
मैं उससे मिला पर शायद मैं उससे नहीं मिला
क्यों की मैं उसके आतंरिक परिचय से अनभिज्ञ था
वह स्वयं की सत्ता , परिवार , समाज, पद ,प्रतिष्ठा ,
का परिचय दे भी कैसे ?
वो खुद की सृष्टि का विधाता और ग्रंथो का सर्वज्ञ था
मैं उससे मिला जब मेरी आँखे उससे मिली
अपने क्रियाकलापों से मानो शिकायत बता रहा हो
पर शायद हम जैसो की वैचारिक परतंत्रता पर
कभी जोर से ,कभी धीरे
कभी हँसते , कभी रोते , कभी पैर फेकते
तो कभी अपने मलिन कपडे को
मुंह में दबाये , अपना व्यंग जाता रहा हो .
मैं उससे मिला और मैंने उसे जाते देखा
वो अभी भी अपनी सृष्टि में मस्त था
पर हर ब्रह्माण्ड में शायद भूख अहम् है
इसलिए कमजोरी से पस्त था
उसके लिए हर चेहरे अजनबी है
तभी व्यवहार में उसके समानता थी
फिर भी सभी अजनबियों के खोखले
व्यवहार ,शब्द , प्रतिक्रिया ,को वो
गहराई से पहचानता है .
शैलेन्द्र ऋषि
वह व्यक्ति था, सामाजिक परिभाषा से
वह पागल था, अपने कार्य व्यवहार से
वह दार्शनिक था , अपने स्वतंत्र विचारो से
और शायद वह देवदूत था
अपने कार्य के पीछे की निर्दोष भावना से
मैं उससे मिला जब मैं विचारो और भानु
की उष्णता से युक्त था
और वो अपने ही ब्रह्माण्ड में टहलता ,जीवन
के झंझटो से मुक्त था
उसने शायद जिंदगी में गालिया ही कमाई थी
तभी तो इन्हें दे वो सामान की मांग करता
मैं भी अन्य संभ्रांतो की भांति उसकी
बातो पर हँस लेता
मैं उससे मिला पर शायद मैं उससे नहीं मिला
क्यों की मैं उसके आतंरिक परिचय से अनभिज्ञ था
वह स्वयं की सत्ता , परिवार , समाज, पद ,प्रतिष्ठा ,
का परिचय दे भी कैसे ?
वो खुद की सृष्टि का विधाता और ग्रंथो का सर्वज्ञ था
मैं उससे मिला जब मेरी आँखे उससे मिली
अपने क्रियाकलापों से मानो शिकायत बता रहा हो
पर शायद हम जैसो की वैचारिक परतंत्रता पर
कभी जोर से ,कभी धीरे
कभी हँसते , कभी रोते , कभी पैर फेकते
तो कभी अपने मलिन कपडे को
मुंह में दबाये , अपना व्यंग जाता रहा हो .
मैं उससे मिला और मैंने उसे जाते देखा
वो अभी भी अपनी सृष्टि में मस्त था
पर हर ब्रह्माण्ड में शायद भूख अहम् है
इसलिए कमजोरी से पस्त था
उसके लिए हर चेहरे अजनबी है
तभी व्यवहार में उसके समानता थी
फिर भी सभी अजनबियों के खोखले
व्यवहार ,शब्द , प्रतिक्रिया ,को वो
गहराई से पहचानता है .
शैलेन्द्र ऋषि
गुरुवार, अप्रैल 01, 2010
सांड की मृत्यु
सांड की मृत्यु हुई
जब शहर लोगो से गुलजार हुआ
वो जहां बैठता था छाँव में
खाने के बाद बहुत सा झूठन
शहर की गलियों में फेका गया
महंगे शीशे की खिड़की से
आज वहां भी दुकाने सज गयी है
रोजाना कुछ चंदे खाकी देवता को देकर
तंग गलियों में अपने समाज के
हर एक की हालत एक सी देख
वो देखता रहा धूप और उसकी
चमक को इधर- उधर
वो अब सांड कहाँ ?
वो बंधा है हर उन विरोधियो से
जो डंडे , हथकंडे लिए खड़े है
उसकी अपनी राहो में
कल ही तो उसके पैर लाचार हुए थे
शान-शौकत की सवारी चढ़ जाने से
पर वो तो पहले से ही लाचार बन गया था
शहर में बने निर्धारित पैमाने से
आज एक आँख है उसकी राहगीरों पर
तो दूसरी उसी चटक धूप पर
अब इंतजार है सिर्फ उन्ही जनों का
जो ज़मीन से उठा अनंत कालो तक उसे
विचरण करने दे उसे पानी पर ।
( सांड केवल जानवर ही नहीं बल्कि स्वतन्त्र विचारो का प्रतीक भी है ।)
शैलेन्द्र ऋषि
जब शहर लोगो से गुलजार हुआ
वो जहां बैठता था छाँव में
खाने के बाद बहुत सा झूठन
शहर की गलियों में फेका गया
महंगे शीशे की खिड़की से
आज वहां भी दुकाने सज गयी है
रोजाना कुछ चंदे खाकी देवता को देकर
तंग गलियों में अपने समाज के
हर एक की हालत एक सी देख
वो देखता रहा धूप और उसकी
चमक को इधर- उधर
वो अब सांड कहाँ ?
वो बंधा है हर उन विरोधियो से
जो डंडे , हथकंडे लिए खड़े है
उसकी अपनी राहो में
कल ही तो उसके पैर लाचार हुए थे
शान-शौकत की सवारी चढ़ जाने से
पर वो तो पहले से ही लाचार बन गया था
शहर में बने निर्धारित पैमाने से
आज एक आँख है उसकी राहगीरों पर
तो दूसरी उसी चटक धूप पर
अब इंतजार है सिर्फ उन्ही जनों का
जो ज़मीन से उठा अनंत कालो तक उसे
विचरण करने दे उसे पानी पर ।
( सांड केवल जानवर ही नहीं बल्कि स्वतन्त्र विचारो का प्रतीक भी है ।)
शैलेन्द्र ऋषि
मैं स्वस्थ्य हुआ
मैं बीमार था समाज मैं
क्यों की सहानुभूति का बढा
रक्तचाप था।
दोगलेपन से दूर रहने के
कारण कमजोरी थी
सच्चाई की तपन शरीर को
अधिक गर्म किये थी
कई वादों का प्रभाव
शुद्ध वात को प्रभावित करता था ।
पर आज मैं स्वस्थ्य हूँ
क्यों की मैं कसाई हूँ
सहानभूति का
सरकारी भावना की ताकत है
वकीलों और आधुनिक पत्रकारों की
शीतलता समेटे हूँ
और सभी वादों को छोड़
उदरवाद का प्रहरी हूँ ।
शैलेन्द्र ऋषि
क्यों की सहानुभूति का बढा
रक्तचाप था।
दोगलेपन से दूर रहने के
कारण कमजोरी थी
सच्चाई की तपन शरीर को
अधिक गर्म किये थी
कई वादों का प्रभाव
शुद्ध वात को प्रभावित करता था ।
पर आज मैं स्वस्थ्य हूँ
क्यों की मैं कसाई हूँ
सहानभूति का
सरकारी भावना की ताकत है
वकीलों और आधुनिक पत्रकारों की
शीतलता समेटे हूँ
और सभी वादों को छोड़
उदरवाद का प्रहरी हूँ ।
शैलेन्द्र ऋषि
मंगलवार, मार्च 23, 2010
आज के क्रांतिकारी
जो निकले थे क्रांति लाने
उनकी पैंटों के ब्रांड बदल गए
सुधारने निकले थे जो दुनिया
उनके घर और मकान बदल गए
कल उतरेंगे सोफे उनके घरो में
आज तो शहर के शमशान बदल गए।
शैलेन्द्र ऋषि
उनकी पैंटों के ब्रांड बदल गए
सुधारने निकले थे जो दुनिया
उनके घर और मकान बदल गए
कल उतरेंगे सोफे उनके घरो में
आज तो शहर के शमशान बदल गए।
शैलेन्द्र ऋषि
सोमवार, मार्च 22, 2010
जूता
अज्ञात दैनिक यात्रा के बाद मैंने कुछ देर पहले ही उसे पृथक किया
मैं पलंग पर ठीक उसी तरह से था
जैसे वो पलंग के नीचे पड़ा था
सहसा मेरी नज़र उस पर पड़ी
रोष में घूरता वो मुझे प्रतीत हुआ
मेरे चेहरे और उसके शरीर पर
धूल का स्तर समान था
चेहरा तो साफ़ हो चुका था
पर उसे अगली यात्रा से पूर्व
ही साफ होना था
इसी रोष में , स्व की उपेछा में
स्थिर वो घूरे जा रहा था
अनेक सार्थक और निरर्थक
यात्राओ में मेरे संग
मुझे सुविधा और खुद का
क्षरण करते हुए परम परोपकारी
वो इतना अधिकार तो रखता ही है
विभिन्न अवसरों पर मैं उसकी
तो वो मेरी पहचान था
मेरे लक्ष्य को ही अपना लक्ष्य मान
सव्गंत्व्य से वह अंजान था
समय -समय पर अपने सुधार की मांग लिए
अभी भी वही समर्पण दिखलाता है
मैं अपना भार उस पर रख और वो
दूसरी पीढ़ी पर , मेरे जीवन से विदा हो जाता है।
शैलेन्द्र ऋषि
मैं पलंग पर ठीक उसी तरह से था
जैसे वो पलंग के नीचे पड़ा था
सहसा मेरी नज़र उस पर पड़ी
रोष में घूरता वो मुझे प्रतीत हुआ
मेरे चेहरे और उसके शरीर पर
धूल का स्तर समान था
चेहरा तो साफ़ हो चुका था
पर उसे अगली यात्रा से पूर्व
ही साफ होना था
इसी रोष में , स्व की उपेछा में
स्थिर वो घूरे जा रहा था
अनेक सार्थक और निरर्थक
यात्राओ में मेरे संग
मुझे सुविधा और खुद का
क्षरण करते हुए परम परोपकारी
वो इतना अधिकार तो रखता ही है
विभिन्न अवसरों पर मैं उसकी
तो वो मेरी पहचान था
मेरे लक्ष्य को ही अपना लक्ष्य मान
सव्गंत्व्य से वह अंजान था
समय -समय पर अपने सुधार की मांग लिए
अभी भी वही समर्पण दिखलाता है
मैं अपना भार उस पर रख और वो
दूसरी पीढ़ी पर , मेरे जीवन से विदा हो जाता है।
शैलेन्द्र ऋषि
दीवार के पार
अक्सर तन्हाइयो में जज्बातों को उकेरने का दिल करता है
चमकती रातो में सितारों पर शहर बसाने का दिल करता है
गुस्सा , प्यार ,नफरत , बटवारा, बहुत हो चुका इस जहां में
किसी नए जहां के भावो पर लिखने को दिल करता है।
आशियाने उजड़ने की बात क्यों किसी क्यों बताये ?
ये तो रोज की बाते हो चली है
अब गैरों को नेस्तनाबूद करके भी खुशियों के गुलस्ते सजाने वालो
के संग घर बसाने को दिल करता है
महफूज करे कब तक अपने को दूसरों से ?
अब तो अपने घर को ही तोड़ने का दिल करता है
क्या करेंगे फरेब का चेहरा लिए ?
सच्चे गुनहगार की शक्ल दिखाने को दिल करता है
अगर ये चंद राहत की चीजे ही तय करती है आयाम जिन्दगी का
तो कसम खुदा तेरी इन चीजो को दुनिया में बिखेरने का दिल करता है
अगर यहाँ न बशर हो सका तो क्या चाँद पर गुजर हो जायेगा ?
आशियाने बदलकर पाकियत समेटने वालो को ख़त्म करने को दिल करता है
सियासत , शख्शियत , रिवाज को कब तक तब्बजो देते रहेंगे
अब हीर राँझा , रोमियो जूलियट ,लैला मझनु के हाथो सल्तनत
सौपने को दिल चाहता है।
क्यों जुदा हो रहे है हमराही अपने सायों से आज?
सभी मजहब के आदमियों को अपने आगोश में
समेटने वाली माटी बनने का दिल करता है
शैलेन्द्र ऋषि
चमकती रातो में सितारों पर शहर बसाने का दिल करता है
गुस्सा , प्यार ,नफरत , बटवारा, बहुत हो चुका इस जहां में
किसी नए जहां के भावो पर लिखने को दिल करता है।
आशियाने उजड़ने की बात क्यों किसी क्यों बताये ?
ये तो रोज की बाते हो चली है
अब गैरों को नेस्तनाबूद करके भी खुशियों के गुलस्ते सजाने वालो
के संग घर बसाने को दिल करता है
महफूज करे कब तक अपने को दूसरों से ?
अब तो अपने घर को ही तोड़ने का दिल करता है
क्या करेंगे फरेब का चेहरा लिए ?
सच्चे गुनहगार की शक्ल दिखाने को दिल करता है
अगर ये चंद राहत की चीजे ही तय करती है आयाम जिन्दगी का
तो कसम खुदा तेरी इन चीजो को दुनिया में बिखेरने का दिल करता है
अगर यहाँ न बशर हो सका तो क्या चाँद पर गुजर हो जायेगा ?
आशियाने बदलकर पाकियत समेटने वालो को ख़त्म करने को दिल करता है
सियासत , शख्शियत , रिवाज को कब तक तब्बजो देते रहेंगे
अब हीर राँझा , रोमियो जूलियट ,लैला मझनु के हाथो सल्तनत
सौपने को दिल चाहता है।
क्यों जुदा हो रहे है हमराही अपने सायों से आज?
सभी मजहब के आदमियों को अपने आगोश में
समेटने वाली माटी बनने का दिल करता है
शैलेन्द्र ऋषि
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